चमोली आपदा : जानिए ग्लेशियर क्या है? ग्लेशियर कैसे पिघलता है?

आज ग्लेशियर लोगों के लिए बहुत बड़ी समस्या बन चुका है, जिसका असर कुछ दिन पहले उत्तराखंड के चमोली जिले में देखने को मिला और इसका खतरा आगे मंडराते जाएगा। 


जानिए ग्लेशियर क्या है? ग्लेशियर कैसे पिघलता है? topkhabar89

ग्लेशियर क्या है?

ग्लेशियर वास्तव में बर्फ का एक बहुत बड़ा समूह होता है, जहां बर्फ विशाल मात्रा में इकट्ठा ही जाती है ओर धीरे-धीरे करके अत्यधिक ठोस हो जाती है. जो धीरे धीरे बहती है। ग्लेशियर को हिंदी भाषा में हिमनद जाता है.

ग्लेशियर के प्रकार :

अगर हम ग्लेशियर के प्रकार की बात करें तो या मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-

पहाड़ी ग्लेशियर (अल्पाइन ग्लेशियर, घाटी ग्लेशियर (Valley glacier))
 बर्फ की चादर

ग्लेशियर कैसे बनते है?

यह उस स्थान पर बनती है जहाँ बहुत अधिक ठंड पड़ती हो. आप इसे हिमालय की पहाड़ियों में देख सकते हैं. वह क्षेत्र जहाँ पर बहुत अधिक ठंड होती है, और बर्फ हर साल बहुत अधिक मात्रा में जमा होती है. ठंड में बर्फबारी होने पर पहले से जमा बर्फ को जो नई बर्फ गिरती है वह पुरानी बर्फ को दबाने लगती है. उसके कारण बर्फ बहुत अधिक ठोसहो जाती है.

जिसके कारण जो हल्की  क्रिस्टल, बर्फ के ठोस गोले के रूप में तब्दील हो जाती है. जिसे हम ग्लेशियर हैं.  निरंतर बर्फबारी होने के कारण पुराने बर्फ को मतलब पुराने ग्लेशियर को दबाने लगती है, जिसके कारण बहुत अधिक कठोर हो जाती है इस प्रक्रिया को फॉर्म कहते हैं.


ग्लेशियर कैसे पिघलते है?

जैसे हमने पहले भी आपको बताया कि  बर्फबारी के कारण बर्फ अधिक मात्रा में जमा हो जाता है. जिसके कारण वह पुरानी बर्फ को मतलब ग्लेशियर को दबाने लगती है. जिस प्रक्रिया को हम फॉर्म कहते हैं. निरंतर बर्फबारी के कारण दबाव पड़ने से ग्लेशियर  बिना किसी तापमान के ही पिघलने लगते हैं, और उसी के साथ साथ वह बहने भी लगता है, बर्फ प्रति दिन सिर्फ कुछ सेंटीमीटर की बहती है. 

हिमस्खलन ( Avalanche ) में तब्दील हो जाने के बाद यह बहुत अधिक खतरनाक हो जाते हैं जब तक यह हिमस्खलन में तब्दील नही होते हैं तब तक यह ज्यादा खतरनाक नही होते हैं।

हिमस्खलन  में बहुत अधिक मात्रा में Glacier पहाड़ों से पिघलकर घाटियों में गिरने लगती है, जो आसपास के नदियों में जाकर कर मिल जाती है. जिससे नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ जाता है चुकि यह घाटियों में होती है, जिसके कारण पानी का बहाव बहुत तेज हो जाता है और जिसके कारण खतरा बहुत अधिक बड़ जाता है. 

जो कुछ भी रास्ते में आता है जल उसे तबाह करते हुए आगे निकलता है। और जब ग्लेशियर पिघल कर पानी में मिलता है तो यहां बहुत ज्यादा अधिक विनाशक हो जाता है, हाल ही में यह घटना उत्तराखंड के चमोली में देखने को मिली है जहाँ ग्लेशियर टूटने से बहुत अथिक तबाही हुई, इस तबाही में भारत सरकार के विद्युत परिजोजना को तहस नहस कर दिया है,


उत्तराखंड : (चमोली आपदा ) ग्लेशियर पिघलने की घटना :

उत्तराखंड के चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने के बाद ग्लोबल वार्मिंग के खतरे को और बढ़ा दिया है, पहाड़ों में ऐसी घटनाएं ग्लेशियर और उनके पिघलने के कारण होती हैं. यह सभी कारण हिमालय पर झीलों की संख्या बढ़ा रहा है ।

उत्तराखंड में ग्लेशियर टूटने की वजह से बहुत बड़ा हादसा तो हो चुका है और अलकनंदा और धौली गंगा उफान पर है. जिसका कारण ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा देना है। इस तबाही में भारत सरकार के विद्युत परिजोजना को तहस नहस कर दिया है.


हिमालय पर ग्लेशियर की स्थिति :

हिमालय क्षेत्र में 800 झीले बन चुकी है और इनका आकार धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है. यह सब तापमान वृद्धि के कारण हो रहा है,  माना जाए तो ग्लेशियर पिघलने से भीषण तबाही का मंजर बन सकता है।


ग्लेशियर क्यों पिघलते है :

मुख्यतः ग्लेशियर पिघलने का कारण निरंतर बड़ते तापमान और कार्बन डाई ऑक्साइड और ग्रीन हॉउस गैसों के कारण है.


वैज्ञानिकों के अनुसार

वैज्ञानिक की मानें तो जलवायु परिवर्तन से यह होने की संभावना मानी जा रही है इसका भी मुख्य कारण तापमान की वृद्धि ही है ।

IPCC('Intergovernmental Panel on Climate Change ') की रिपोर्ट के अनुसार एशिया के ऊंचे पर्वतों की ग्लेशियर अपनी एक तिहाई बर्फ खो सकते हैं. लेकिन यह तब होगा जब हमारी पृथ्वी से ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन नहीं हो पाएगा। जिससे पृथ्वी की सतह पर गर्मी बढ़ेगी और ग्लेशियर पिघलने लगेंगे. जिससे भयानक बाढ़ , नदियों , समुद्रों में असंतुलन भोजन , ऊर्जा खेती , प्रदूषण , पर्यावरण और सभी जनजीवन प्रभावित होगा।


पृथ्वी पर करीब दो लाख ग्लेशियर है. ध्रुवीय इलाकों के बर्फ की चादर तुलना में छोटे होने के कारण उस इलाके में ज्यादा आपदा देखने को मिलेगी. ग्लेशियर ही वहां पानी का स्त्रोत है और उनके आसपास रहने वाले लोगों को यह संकट पैदा कर सकती है। ग्लेशियर पिघलने से समुद्र तल का बढ़ना तो पक्का है जो आगे आपदा को बुलावा दे सकती है ।

एक स्वस्थ ग्लेशियर गर्मी में थोड़ा पिघलता है और ठंडी में बड़ा हो जाता है जिससे ठंड और गर्मी दोनों का संतुलन बरकरार रहता है.

अगर ग्लेशियर पिघल के पानी बन गए और पानी ग्लेशियर से आना बंद हो गया तो कृषि पर बहुत बड़ा संकट आ सकता है ग्लेशियर में से ही नदियों का माध्यम है ग्लेशियर ही नहीं रहेंगा तो नदियां सूख जाएगी।

लेकिन जब ग्लेशियर अधिक मात्रा में  पानी बनकर नदियों निकलेगी तो यह नदियों समुद्रों को असंतुलित कर देगी जो एक भयावह सपने की तरह है।

टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां